आज हम कुछ महत्वपूर्ण विषयों पर देशवासियों का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं खासकर के वे लोग जो 1990 के पहले समाज का एक बड़ा हिस्सा जो पगडंडियों और खेतों में खोया था। जो जमात लोकतंत्र में अपने अधिकार और कर्तव्यों से पूरी तरह से महरूम था। सत्ता और संपत्ति पर हजारों वर्षों से कब्जा जमा रखा था। उनका मुंह इनके दमन नीतियों के खिलाफ नहीं खुलता था। पहले के जमाने में वोट किसी का और राज किसी का यह कहावत चरितार्थ हुआ करता था पर इस लोकतांत्रिक देश में एक के बाद एक सत्ता के शीर्ष पर बैठते रहे जिसमें कई पिछड़े जमात से भी थे, दलित वर्ग से थे, अत्यंत पिछड़े वर्ग से भी थे पर इन बहुसंख्यक जमातों का नाही किसी ने सूद लिया और ना ही उनके दर्द और पीड़ा में रिश्ता जोड़ना मुनासिब नही समझा। 1989 में जब इस देश के अंदर राष्ट्रीय मोर्चा और वाम मोर्चा की सरकार बनी जनता दल के तरफ से देश के प्रधानमंत्री के रुप में आदरणीय बीपी सिंह जी प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुए। तदोपरांत 1990 में बिहार की राजनीति में एक जबरदस्त मोड़ आया। जिसके पृष्ठभूमि की तैयारी 1977 में मुख्यमंत्री के रूप में जननायक कर्पूरी ठाकुर ने तैयार किया था। वंचित समाजों में हल्की फुल्की राजनीतिक सुगबुगाहट जगी ही थी की मुट्ठी भर मानुवादी ताकतों ने रामसुंदर दास को हथियार बनाकर जनता की चुनी हुई लोकप्रिय सरकार को पलट दिया और फिर से 10% वाले लोगों ने सत्ता पर अपना एकाधिपत्य जमा बैठा। फिर से उन ताकतो का सिक्का 90 परसेंट कमजोर तबकों पर चलने लगा।
लंबे संघर्ष के बाद 1990 में मान्यवर श्री लालू प्रसाद जी के नेतृत्व में जनता दल गठबंधन की बिहार में सरकार बनी उस समय झारखंड बिहार का हिस्सा हुआ करता था। उस सरकार में शिबू सोरेन, वामदल सहित कई आंदोलन से जुड़े हुए लोगों के प्रतिनिधि सरकार के हिस्सा बने। वंचित समाज ने आशा की टकटकी निगाह से माननीय लालू प्रसाद जी को अपना नेता माना ही नहीं बल्कि मसीहा के रूप में पूजने लगे। मंडल कमीशन का आंदोलन उस समय इतना तेज हुआ कि उस की आंच में बिहार में कई आंदोलन को जन्म दे दिया। कई लोगों ने तो मंडल कमीशन के खिलाफ आत्मदाह जैसी घिनौनी हरकतें करने पर आमदा हो गए। धीरे धीरे कारवां बढ़ता गया। पिछड़ों में एक क्रांतिकारी परिवर्तन की आस जगने लगी और हुआ भी वही यह बड़ा परिवर्तन जो बिहार के भूमि से निकलकर देशभर के लोगों में डॉक्टर लोहिया का वह सपना जो कभी लोकसभा में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को इशारा करते हुए कहा था कि बहन इंदिरा वोट का राज का मतलब होता है छोट का राज इसे चरितार्थ करके सर सरजमीं पर हम समाजवादियों ने उतारा है। आप याद करें एक तरफ ग्वालियर की रानी और एक तरफ बिहार से पत्थर तोड़ने वाली भगवतीया देवी, जो मुशहरणी जाति से आती है वह मेहतरानी बिहार के विधानसभा की सदन की शोभा बढ़ा रही है। इस आंदोलन को दबाने की कोशिश मत करना वरना एक दिन तुम्हें वंचित समाज तानाशाह लोगों को लील जाएगी।
लील ही नहीं जाएगी बल्कि मुट्ठी भर लोगों का सत्ता पर से एकाधिकार खत्म हो जाएगा। उसी की परिणति है कि लालू प्रसाद बिहार में पिछड़ों के मसीहा के रूप में स्थापित हुए। उन सभी समाजवादियों के विश्वास पर लालू प्रसाद जी ने खरा उतरने का काम किया। समाजिक परिवर्तन के लहर के आगे लाचार और बेबस देख मनुवादी ताकतों ने पाखंड, फरेब और षड्यंत्र का सहारा लेकर लालू प्रसाद जी के खिलाफ पूरा कुचक्र रचने का काम किया। इस देश के संवैधानिक इतिहास में पहली घटना है कि संवैधानिक संस्था रंगभेद, ऊंच-नीच, नस्ल का सहारा लेने का काम किया है। लालू प्रसाद जी उस षडयंत्र के शिकार हो चुके हैं। लालू परिवार आज उन मानवादी ताकतों के पूरे-पूरे निशाने पर हैं। जिस मुख्यमंत्री ने पशुपालन घोटाले के जांच के आदेश दिए हो, आरोपितों के संपती अटैच करने के कड़े संदेश दियें हो और वही मुख्यमंत्री को इस षडयंत्र का हिस्सा मान कर के फसाया जाता है। यह एक बड़ी विचित्र पटकथा है। जिसकी गहराइयों में जाने के बाद आप जब गंभीरता से इन सारे घटना चक्रो पर नजर डालेंगे तो आप देशवासियों को दांतों तले अंगुलियां चिबानी पड़ेगी। इस देश में कानून षड्यंत्र का हिस्सा बनते आ रहा है। हमने पशुपालन घोटाला के 563 पृष्ठ को बिंदुवार अध्यन करने का काम किया है पर उसमे एक वाक्या, एक शब्द भी हमने वहाँ नही पाए जो कानून को प्रभावित करता हो।
![]() |
| image sourse - google |
120/बी साजिश और षड्यंत्र करने वाले के खिलाफ लगाए जाते हैं। इस देश में धड़ल्ले से सेवा का विस्तारीकरण, नियुक्ति-प्रतिनियुक्ति बदस्तूर जारी है। क्या कोई राज्य का मुख्यमंत्री किसी पद पर अगर किसी को नियुक्त करता है और उस पर वितीय अनियमितता का आरोप लगता है उसकी सजा किसी मुख्यमंत्री को होता है? हाँ ऐसा हुआ आप इसे आश्चर्यचकित होकर ना देखें। वह वही शख्स है जिसने गरीबों, मजलूमों, कमजोर तबके की आवाज बनकर इस देश में दहाड़ता है। उस शख्स का नाम लालू प्रसाद है। लगातार यातनाएं सहने के बावजूद भी श्री प्रसाद ने सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता, किसान और मजदूर की आवाज को कभी कमजोर होने नहीं दिया। मुझे वो वाक्या याद है जो आज मैं लिख रहा हूं तो उन दिनों की याद आती है जब श्री लालू प्रसाद जी मीडिया से बात करते हुए कहा करते थे नली और गली, मिट्टी में मिल जाना पसंद करुंगा पर फिरकापरस्त ताकतों के आगे घुटना टेकने का काम नही करूँगा। मैं सलाम करता हूं उस शख्सियत को जिसने इस अग्नि पथ पर चलकर भी अपने पांव को डगमगाने ना दिया।
जिस समय रांची कोर्ट में लालू प्रसाद जी को सजा सुनाई गई थी, बिहार के कई गरीब-गुरबों के घर में चूल्हे नहीं जले थे। कई लोग तो इस खबर को सुनकर सदमे में इस तरह चले गए कि अपने प्राण को ही गवा दिया। याद करिए बिहार के प्रजातंत्र की उस गरीब घर के थके हुए लोगो जिसने श्री लालू प्रसाद जी को गरीबों का मसीहा मानकर पूजा करते रहे और खबर सुनते ही सदमे में इस कदर खोया की सदा-सदा के लिए सोया ही रह गया। इस देश के अंदर करोड़ों लोग हैं जो देश के अंदर लालू प्रसाद जी के मशाल को साथ मे लेकर दीवानो की तरह घूमता रहता है। कल तक जिन लोगों ने पिछड़ों के आंदोलन के उपज के रूप में नीतीश कुमार को अपना रहबर मानकर कुंठित प्रयास किया था नितीश कुमार को विकास पुरुष कहते नहीं थकते थे उन लोगों का चरित्र भी बिहार के मुख्यमंत्री के सामने धीरे-धीरे परत दर परत खुलता गया। चाहे-अनचाहे साथ चलते रहे और कुछ कालांतर के बाद भगवा भेष के रूप में नरेंद्र मोदी का पादुरभाव की जब सुगबुगाहट सामने आई तो नीतीश कुमार के मन में लालू प्रसाद जी के एक-एक दिन सामने दिखने लगे। 17 साल का चला आ रहा है एनडीए गठबंधन बिहार में टूट गया। लोगों ने समझा था कि लालू और नीतीश के बीच में इतनी खाई बन चुकी है कि यह दोनों एक प्लेटफार्म पर कभी नहीं आयेंगे ऐसा उन्हें विश्वास था पर मनुवादियों के विश्वास को उस समय धक्का लगा जब बिहार में महागठबंधन ने आकार लिया।
लालू प्रसाद जी परित्याग कि मूर्ति हैं। यह उन्होंने कई बार साबित कर दिखाया है। महागठबंधन की सरकार बनने के पहले लालू प्रसाद जी ने देशवासियों को विश्वास दिलाया था की महागठबंधन के घटक दलों को चाहे कितना भी सीट क्यों न आ जाए, राष्ट्रीय जनता दल बड़ी पार्टी के रुप में ही क्यों ना उभरे पर बिहार के महागठबंधन के मुखिया बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही होंगे और अपने निर्णय पर अडिग रहने वाले लालू प्रसाद जी ने यह कर दिखाया। आप जानते हैं कि महागठबंधन के सबसे बड़े घटक दल राष्ट्रीय जनता दल बावजूद श्री लालू प्रसाद जी ने अपने वचन को टूटने ना दिया और अपने छोटे भाई श्री नितीश कुमार के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार को अंगीकार किया। अंगीकार ही नहीं बल्कि स्वतंत्र भी किया सरकार चलाने के लिए। कई साझे निर्णय बिना रोक-टोक निर्वाद तरीके से हुए। इस सरकार को चलने में अपना सहयोग जारी है। कुछ नेता और कुछ पार्टी के प्रवक्ता भी बयानों में भिन्नता दिखाने की कोशिश करते हैं पर लालू प्रसाद जी एक लाइन में यह कहकर इन सभी अटकनो को विराम लगा देतें हैं। ये गठबंधन अटूट है बयानों से सरकार के सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। फिर क्या था भाजपा की आखें लाल हुई। अपने को हरा-थका महसूस कर रहा भाजपा फिर से संवैधानिक संस्थाओ को हथियार बनाकर इनके खिलाफ षड़यंत्र के जाल बिछाने शुरू कर दिए। इसमें कई खबरिया चैनल जो बीजेपी संपोषित है इसे हवा देंने में कोई कसर छोड़ा ही नहीं। बल्कि दस कदम आगे बढ़कर पार्टी का रौल अदा करने लगे। उन्हें सोचना चाहिए षड़यंत्र षड़यंत्र ही होता है।
सच परेशान होता है पर हारता नहीं है। मुझे तो कभी-कभी भारतीय जनता पार्टी पर तरस भी आता है। उनके निर्णयों ने बीजेपी के हौसलों का धीरे-धीरे खोखला करते जा रहा है पर उन्हें समझ में नहीं आ रहा है। कई बार हमने आगाह किया है जितने लालू प्रसाद जी पर प्रहार करियेगा उतना ही लालू प्रसाद मजबूत होंगे और आप हांसिये पर चले जायेंगे। फिर भी अपने करिस्तानी से ये षड्यंत्रकारी बाज नहीं आते हैं। चुकी फरेब, पाखंड और जुमलेबाजी के आधार पर ही इस देश में नरेन्द्र मोदी की मौका परस्त शासन का निर्माण हुआ है। आगे जारी रहेगा.........................
मित्रों अगले एपिसोड में इस विषय को हम और आगे आपके समक्ष रखेंगे। इस पुरे लेख पर आपने सुविचार, आपके टिप्पणी के साथ आमंत्रित किये जाते हैं।

http://thinkultimate.blogspot.in/2016/05/blog-post.html
जवाब देंहटाएं